Tuesday, March 20, 2012

***बेटीयों के नसीब***

॰॰॰बेटीयों के नसीब॰॰॰

बेटी बनकर आई हूँ॰॰॰
माँ-बाप के जीवन में,
बसेरा होगा कल मेरा कहाँ॰॰॰
जाने किसके आँगन में,

क्यों ये रीत इस दुनियां ने॰॰॰
हम बेटीयों के लिये बनाई है,
बचपन जब बाबुल का घर है॰॰॰
फिर क्यों उनसे ये जुदाई है,

जब मैं बहुत छोटी थी॰॰॰
खिलोनों से खेला करती थी,
गुड्डे-गुडियों की शादी करके॰॰॰
झूठ-मूठ रोया करती थी,

अब आज जब मेरी विदाई है॰॰॰
वो बात समझ में आई है,
बचपन की वो बातें सोचकर॰॰॰
आँख मेरी भर आई है,

ओ बाबुल तेरे साथ रही हूँ॰॰॰
आज कैसी तुमसे ये जुदाई है,
बचपन खेला जब आँगन में तेरे॰॰॰
आज ना कहो के, तू पराई है,

ऐ खुदा, क्यों ये रिश्ता हमारा॰॰॰
दुनियां से अलग चलाया है,
जाने क्यों सिर्फ हम बेटीयों का॰॰॰
तुमने नसीब ऐसा बनाया है॰॰॰!!!

अवतार रायत

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